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वातानुकूलित रेशम बना आय का अच्छा जरिया

 

जशपुर में ऐसे रेशम का उत्पादन होता है जो कि ठंड में गर्मी और गर्मी में ठंड का अहसास देता है। यही कारण है कि इसे वातानुकूलित रेशम कहा जाता है। इस प्रकार का रेशम अरंडी अथवा ईरी के वृक्षों से होता है। इसका उत्पादन मुख्यत: उत्तरपूर्वी राज्यों के पहाड़ी क्षेत्रों में होता है। प्रदेश में जशपुर जिला समुद्र तल से अधिक ऊंचाई पर होने के कारण इसकी संभावनाओं को देखते हुए ईरी रेशम उत्पादन का कार्य प्रायोगिक तौर पर वर्ष 2003-04 से प्रारंभ किया गया है। इसे सफलता मिली तथा वर्ष 2003-04 से प्रारंभ किया गया है। इसे सफलता मिली तथा वर्ष 2003-04 में ही इसका उत्पादन 173 किलोग्राम हुआ।

 रेशम अधिकारी बताते हैं कि इसके बाद से जशपुर जिले में ईरी रेशम उत्पादन निरंतर बढ़ रहा है। विगत 4 वर्ष में इसका उत्पादन 2899 किलोग्राम के करीब हुआ है। इस वातानुकुलित रेशम को खरीदने के लिए यहां देश के दूर-दूर से व्यापारी आते हैं। इस ईरी रेशम से बने कपड़े बड़े शहरों के शॉपिंग मॉल में तेजी से बिक रहे हैं।

 ईरी रेशम उत्पादन ने गरीब एवं आदिवासियों को रोजगार भी उपलब्ध कराया है। कृषक इसकी कृषि से प्रतिवर्ष 15000 रूपये प्रति एकड़ तक आय प्राप्त कर सकते हैं। रेशम अधिकारी श्री विश्वास बताते हैं कि इसका वृक्ष बहुत ही उपयोगी है। कृषक रेशम के साथ-साथ अरंडी वृक्ष से आज अतिरिक्त आमदनी भी ले रहे हैं। हर्बल औषधियों में अरंडी के वृक्ष की काफी मांग है। व्यापारी वर्ग, यहां के कृषकों से इनके बीजों को क्रय कर औषधी कम्पनियों को बेंच भी रहें हैं।

 दिन-प्रतिदिन इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य शासन द्वारा ईरी रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। इसका विस्तार जशपुर जिले के पाठ क्षेत्रों में किये जाने का लक्ष्य भी है। वर्ष 2006-07 में जिले में इसका उत्पादन 1165 किलोग्राम था तथा इससे 34 हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया है। इसकी संभावना को देखते हुए वर्ष 2008 में 40 एकड़ क्षेत्र में अरंडी पौध रोपण किया गया। इस वर्ष 21 सौ किलोग्राम का उत्पादित करने तथा 100 हितग्राहियों को लाभान्वित किये जाने का लक्ष्य है।

 

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