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नीले सोने से चमका दक्षिण बस्तर

 

आज बढ़ती आवश्यकताओं को देखते हुए अधिक रोजगार, प्रोटीनयुक्त आहार एवं आतमनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम के रूप में दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले में मछलीपालन एक बेहतर विकल्प के रूप में साबित हो रहा है। दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले में मत्स्योद्योग विभाग द्वारा ग्रामीण एवं सिंचाई जलाशयों में मत्स्य पालन के अधिकार भी पंचायतों को सौंपकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इनकी भागीदारी को बढ़ाया गया। राज्य के सुदुर दक्षिणतम जिले में मत्स्य विभाग द्वारा सरकार की योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध जल संसाधनों में आवश्यक सुधार तथा नये जल संसाधनों का सृजन करते हुए उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर मत्स्य बीज एवं मत्स्योत्पादन में वृध्दि की जा रही है वहीं रोजगार के अवसरों को बढ़ाते हुए अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े तबको के किसानों को प्राथमिकता देकर उनके सामाजिक आर्थिक स्तर में उन्नति करने का प्रयास किया जा रहा है।

 कुछ सफल कृषकों में गीदम विकासखंड के ग्राम मड़से की श्रीमती बोधो पति भुनेश्वर ने मुण्डे में मत्स्यपालन कर चार हजार 700 रूपए की आय तथा मुण्डें से सिचिंत रकबें में साग-सब्जी उगा एक हजार 900 रूपए की आय प्राप्त की। इस प्रकार उसने कृषि के अतिरिक्त छह हजार 600 रूपए की अतिरिक्त आय प्राप्त की। इसी तरह गीदम विकासखंड के ग्राम आलनार के श्री समलू पिता पाण्डू द्वारा अपने मुण्डे में मछली उत्पादन सह झींगा पालन द्वारा 180 किलो झींगा उत्पादन कर तीन हजार 600 रूपए तथा 600 किलो मछली उत्पादन कर 12 हजार रूपए की आय प्राप्त की। कृषक श्री समलू ने कृषि के अतिश्रिक्त 15 हजार 600 रूपए की अतिरिक्त आय प्राप्त की। कोंटा विकासखंड के ग्राम दुब्बाटोटा निवासी श्री मड़कम पिता श्री मुया द्वारा अपने एक हेक्टेयर के नवनिर्मित मुण्डे से धान की खेती के साथ-साथ मछलीपालन कर एक हजार किलो मछली विक्रय कर बीस हजार रूपए एवं 8 क्विंटल धान का उत्पादन किया गया। शासन द्वारा मछुआरों के बीच सहकारिता को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य तथा मछलीपालन के धंधे में महिला मत्स्य उद्यमियों की भागीदारी को भी बढ़ाया जा रहा है। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अनेक कार्यक्रम चलाऐ जा रहे हैं इसके उत्साहजनक परिणाम भी अब सामने आने लगे है। राज्य निर्माण के समय दंतेवाड़ा जिले में 579.49 हेक्टेयर क्षेत्र के 315 जलाशयों का सर्वेक्षण कर मछलीपालन के लिए चिन्हित किया गया था। राज्य की प्रथम निर्वाचित सरकार द्वारा विगत चार वर्षों में जिले में चलाये गये सर्वेक्षण अभियान, राहत कार्यों व जल ग्रहण मिशन एवं स्वयं की भूमि में तालाब निर्माण योजना के अथक प्रयास से मछली पालने योग्य 3 हजार 282 तालाब तैयार किए गए है, जिनका जलक्षेत्र 3 हजार 960 हेक्टेयर है। जिले में उपलब्ध ग्रामीण तालाबों को पंचायतों के माध्यम से गरीबी रेखा के अन्तर्गत आने वाले हितग्राही कृषकों को पांच वर्ष के पट्टे पर दिया जा रहा है। राज्य शासन द्वारा वर्तमान में मत्स्यपालन योग्य 2 हजार 368 ग्रामीण तालाबों जिनका जलक्षेत्र तीन हजार 220 हेक्टेयर है, को मत्स्य पालन अंतर्गत लाया गया है। जिले में राज्य निर्माण के पहले जहां प्रति हेक्टेयर उत्पादन ग्रामीण तालाबों में 374 किलो प्रति हेक्टेयर तथा सिंचाई जलाशयों में 43 किलो प्रति हेक्टेयर था, वहीं संसाधनों के बेहतर दोहन एवं कृषकों को मछली पालन की उन्नत तकनीकी जानकारी उपलब्ध करा मत्स्य उत्पादन की दर में दोगुनी से भी अधिक बढ़ोत्तरी की गयी है। जिले में आज ग्रामीण तालाबों में दो हजार 35 किलो प्रति हेक्टेयर और सिंचाई जलाशयों में 72 किलो प्रति हेक्टेयर है। दंतेवाड़ा जिले में डबरी निर्माण योजनांतर्गत एक हजार 115 डबरियों का निर्माण कर उनमें भी मछलीपालन किया जा रहा है। आज मछलीपालन कम लागत एवं कम श्रम में अधिक आय देने वाले व्यवसाय के रूप में स्थापित हो चुका है।

 दंतेवाड़ा जिले में बारिश के दिनों में धान के खेतों में बरसात का पानी भरा रहता है तथा कुछ स्थानों पर आसपास के क्षेत्र का पानी भी एक जगह एकत्रित हो जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में मुण्डा कहते है। राज्य सरकार द्वारा इन मुण्डो में भी मछलीपालन के लिए शत-प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है। इस योजना का लाभ आज नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर जिले के आदिवासी मत्स्य पालक काफी तादाद में ले रहे है और उससे उनकी आय में भी अच्छी बढ़ोत्तरी हुई है।

 

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