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नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर और बीजापुर में भी पहुंची
साक्षरता की रोशनी
नक्सल हिंसा और आतंक से प्रदेश के सबसे अधिक प्रभावित दक्षिण
बस्तर (दंतेवाड़ा) और बीजापुर जिले में भी साक्षरता अभियान की
रोशनी पहुंचकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने लगी है। इस अभियान के
तहत् यहां की ज्ञान गुड़ियों (साक्षरता केन्द्रों) ने अक्षर
ज्ञान की रोशनी फैलाने के साथ जन-जागृति के केन्द्रों के रुप
में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के
अंतिम चरण में कराए गए आंतरिक मूल्यांकन में तत्कालीन अविभाजित
दक्षिण बस्तर जिले में एक लाख
28 हजार 712 नवसाक्षर
उत्तीर्ण होकर साक्षर बने और 12 हजार
658 नवसाक्षरों ने पांचवीं की परीक्षा
उत्तीर्ण की। नवगठित बीजापुर जिले के नवसाक्षर भी इनमें शामिल
हैं। नक्सलवाद के खिलाफ दोनों जिलों में आम जनता के 'सलवा
जुडूम' शांति अभियान चल रहा है। इस
अभियान से जुड़े ग्रामीणों और नक्सल पीड़ित परिवारों के लिए
राज्य शासन संचालित शिविरों में साक्षरता की कक्षाएं भी चल रही
हैं, जहां चार हजार 215
ग्रामीण अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हुए
पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं। इस वर्ष विगत 11
मई को जिला पुनर्गठन के फलस्वरूप दक्षिण बस्तर
से अलग होकर अस्तित्व में आए बीजापुर जिले में भी साक्षरता
अभियान प्रगति पर है।
यह भी उल्लेखनीय है कि तत्कालीन अविभाजित दक्षिण बस्तर
(दंतेवाड़ा) प्रदेश का सबसे कम साक्षरता वाला जिला है,
जहां साक्षरता अभियान को विपरीत परिस्थितियों
में भी यह सफलता मिली। आदिवासी बहुल इस जिले में विभिन्न
आंचलिक बोलियां भी प्रचलन में है। वर्ष 2001
की जनगणना में इस जिले की साक्षरता दर
24.56 प्रतिशत थी। अविभाजित जिले में पुरूष
साक्षरता की दर 32.39 प्रतिशत और महिला
साक्षरता की दर 16.85 प्रतिशत है। जिले
में एक जुलाई 2004 से सम्पूर्ण
साक्षरता अभियान की शुरूआत हुई। नक्सलवाद और शिक्षा के प्रति
लोगों में रूचि की कमी जैसी समस्याओं के साथ यहां के विभिन्न
भाषा-भाषी लोगों के लिए साक्षरता अभियान का कार्य संचालित करना
काफी चुनौतिपूर्ण था। इन परिस्थितियों में जिला साक्षरता समिति
ने जिले के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाने वाली गोंडी भाषा
में एक प्राइमर तैयार करके साक्षरता अभियान के तहत निरक्षरों
की पढ़ाई का कार्य प्रारंभ किया। इसके माध्यम से लोगों को
हिन्दी भाषा से जोड़ने का प्रयास किया गया।
दोनों जिलों में निरक्षरों को पठन-पाठन के लिए प्रेरित करने
के उद्देश्य से साक्षरता नारों के दीवार लेखन,
कला-जत्थों, पाम्पलेट,
पोस्टर, रैलियों,
खेल प्रतियोगिताओं और विभिन्न भाषा-बोलियों के
गीतों और नाटकों का सहारा लिया गया। इससे शिक्षा का वातावरण
तैयार करने और लोगों को इस अभियान से जोड़ने मदद मिली। अभियान
के तहत जिले में 5343 ज्ञान गुड़ी
(साक्षरता केन्द्र) खोले गये, जिनमें
कुल एक लाख 44 हजार 532
निरक्षर दर्ज हुए और एक लाख 42
हजार 325 निरक्षरें ने
अध्ययन प्रारंभ किया। ज्ञान गुडी केन्द्र प्राय: रात्रि में
संचालित होते थे। जहां लोग दिन भर अपने काम काज के बाद रात्रि
में भोजन के पश्चात जुटते। यहां पठन पाठन के बाद लोग रात्रि
विश्राम भी इन्हीं केन्द्रों में करते। पढ़ने-पढ़ाने के इस
वातावरण को बनाए रखने के लिए हर माह विकासखण्ड वार अक्षर
यात्रा का आयोजन किया जाता रहा, जिससे
साक्षरता अभियान जनमानस के काफी करीब आ गया। महिलाओं की पढ़ाई
पर भी अभियान में विशेष ध्यान दिया गया। महिलाओं की सुविधा
अनुसार साक्षरता केन्द्र का समय तय किया गया और पढ़ाने के लिए
महिलाओं की नियुक्ति की गई।
सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के अंतिम चरण में कराए गए आंतरिक
मूल्यांकन में तत्कालीन अविभाजित दक्षिण बस्तर जिले में एक लाख
28 हजार 712 नवसाक्षर
उत्तीर्ण हुए। इसके साथ ही साथ शिक्षा सत्र 2004-05
में कक्षा 5वीं की
बोर्ड परीक्षा में 1500 नवसाक्षर
सम्मिलित हुए, जिसमें से 502
नवसाक्षरों के अपने प्रथम प्रयास में ही बोर्ड
परीक्षा उत्तीर्ण की। इसमें महिलाओं की संख्या पुरूषों से
ज्यादा थी। वर्ष 2005-06 में दो हजार
नवसाक्षर 5वीं बोर्ड परीक्षा में
सम्मिलित हुए, इसमें से 922
नवसाक्षरों ने परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष
2006-07 में जिले के लगभग 2300
नवसाक्षरों ने 5वीं
बोर्ड परीक्षा का फार्म भरा, जिसमें से
14000 नवसाक्षर परीक्षा में सम्मिलित
हुए और 11,234 नवसाक्षरों ने बोर्ड
परीक्षा उत्तीर्ण की। वनोपज संग्रहण कार्य और नक्सलियों के
आतंक से पलायन के कारण बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले
नवसाक्षरों की संख्या में कमी आयी। एक बार फिर परीक्षा
उत्तीर्ण करने वालों में महिलाओं का प्रतिशत पुरूषों से अधिक
था। इन परिणामों से ऐसा लगता है कि साक्षरता अभियान के कारण
दंतेवाड़ा जिले में महिलाओं की रूचि शिक्षा के प्रति तेजी से
बढ़ी।
साक्षरता अभियान के प्रथम चरण का उद्देश्य लोगों को साक्षर
बनाना था,
किन्तु दंतेवाड़ा जिले ने लक्ष्य से आगे निकलते
हुए न केवल ग्रामीणों को साक्षर बनाया बल्कि यहां
12,658 नवसाक्षरों ने 5वीं
बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण की। इन 5वीं
उत्तीर्ण नवसाक्षरों में से कई जनपद अध्यक्ष,
उपाध्यक्ष, सरपंच और
पंच शामिल हैं, जो अपनी सफलता का श्रेय
साक्षरता अभियान को देते हैं। जिले के कई नवसाक्षर 5वीं
उत्तीर्ण कर भृत्य, आंगनबाड़ी
कार्यकर्ता और रसोईयों का कार्य कर रहे हैं। साक्षरता अभियान
से आयी जागृति से महिलाओं में विशेष उत्साह का संचार हुआ। इन
महिलाओं में से कई महिलाओं ने स्व-सहायता समूह बना कर झाडु,
टोकनी, बांस की
कलाकृतियां तैयार करने और मसाले तैयार करने का काम प्रारंभ
किया। वैसे तो पूरा दंतेवाड़ा जिला ही नक्सल प्रभावित है,
लेकिन नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र
बीजापुर, उसूर,
भोपालपटनम, कोन्टा,
सुकमा और भैरमगढ़ में साक्षरता की कक्षाएं
उत्साहपूर्वक चली। इस अभियान का एक और सकारात्मक परिणाम सामने
आया, जो लोग नक्सलियों के आतंक के कारण
घरों से नहीं निकलते थे। वे अब ज्ञान गुड़ियों तक आने लगे।
बीजापुर विकासखण्ड में जहां से नक्सली विरोधी अभियान सलवा
जुडूम की शुरूआत हुई,
वहां साक्षरता कक्षाओं की स्थिति सबसे अच्छी
देखी गयी। शिक्षा के साथ लोगों में यह जागरूकता आयी कि नक्सली
उनका शोषण कर रहे हैं। ग्रामीणों में आयी इस जागृति ने सलवा
जुडूम अभियान को और भी अधिक मजबूती दी। जिले की दो उपजेलों के
281 कैदी भी इस अभियान के माध्यम से
अक्षर ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले
में जहां वृक्षों के सघन जंगलों से होकर शिक्षा की रोशनी पूरी
तरह नहीं पहुंच पा रही थी, वहां
साक्षरता अभियान ज्ञान और चेतना का प्रकाश लेकर आया। इस आंदोलन
ने जिले के निरक्षर को साक्षर बनाकर ना सिर्फ उन्हें रोजगार के
साधनों के जोड़ने में ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अपितु इस
अभियान के जरिए हुए चेतना के संचार ने नक्सल विरोधी ऐतिहासिक
सलवा जुडूम जन आंदोलन को मजबूती भी प्रदान की। तत्कालीन
अविभाजित दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले को साक्षरता अभियान की
सराहनीय उपलब्धि के लिए राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल
द्वारा इस वर्ष विगत अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर
सत्येन मैत्रेय स्मृति साक्षरता पुरस्कार से भी नई दिल्ली में
सम्मानित किया जा चुका है।

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