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166
रुपये महीना
मिलते हैं,
परमवीर चक्र विजेता को
इससे बुरी तरह टूट चुके है.कैप्टन
नई दिल्ली
:
सियाचिन की अमानवीय
परिस्थितियों में अपूर्व पराक्रम दिखाते हुए
1987
में एक पाकिस्तानी चौकी पर कब्जा जमाने वाले परमवीर चक्र
विजेता कैप्टन बाना
सिंह आज अपने हालात और सरकारी रवैये से बेहद हताश हैं। इस मेडल
के लिए मानदेय के
रूप में आज भी
166
रुपये की मासिक रकम
पाने वाले कैप्टन सिंह बुरी तरह टूट चुके हैं। वह इस बात पर
शर्मिंदा हैं कि कभी उन्होंने इस देश की सेवा
की।
सालों तक मातृभूमि की नि:स्वार्थ सेवा करने वाले कैप्टन सिंह
ने
सियाचिन ग्लेशियर में जिस वीरता का परिचय दिया,
उसके लिए उन्हें सर्वोच्च वीरता
पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने पाकिस्तान की सबसे
अहम चौकी 'कैद'
पर
कब्जा जमाया था। बाद में उनके सम्मान में इस चौकी का नाम बदलकर
'बाना
पोस्ट'
कर
दिया गया। परमवीर चक्र के लिए बाना को
166
रुपये मासिक की मानदेय राशि तय की गई,
जो
आज भी उतनी ही दी जाती है। उन्होंने यह राशि बढ़वाने के लिए
जम्मू-कश्मीर सरकार से
कई बार गुजारिश की। इधर-उधर भी हाथपैर मारे,
लेकिन सभी प्रयास बेकार साबित हुए।
हमारे सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ ने जानना चाहा कि इस रकम को
सम्मान के तौर पर
देखा जाना चाहिए या अपमान के रूप में। इस पर बाना सिंह की
हताशा का सैलाब फूट पड़ा।
उन्होंने कहा,
मुझे शर्म आती है कि मैंने अपने देश की सेवा की। सरकार हमारे
साथ ऐसा
रूखा बर्ताव करती है,
मानो हम भिखारी हों। कैप्टन सिंह कहते हैं,
जब एक आतंकवादी
सरेंडर करता है,
तो उसे 2000
रुपये मिलते हैं और मुझे देश की सेवा के बदले
166
रुपये। मैं अपमानित और असहाय महसूस कर रहा हूं। अगर सरकार का
रवैया यही रहा,
तो मैं
परमवीर चक्र लौटा दूंगा।
शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है कल्याण
कल्याण (न.प्र.):
राजनीतिक,
आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अपना अस्तित्व कायम करने के
बाद
अब हिंदी भाषी समाज कल्याण और उसके आसपास शैक्षणिक क्षेत्र में
भी क्रांति लाने की
ओर कदम बढ़ा रहा है। वैसे शिक्षा के क्षेत्र में उसने अपनी
उपस्थिति कई सालों पहले
ही दर्ज कर दी थी पर उच्च शिक्षा,
विशेषकर मेडिकल एवं इंजीनियरिंग के क्षेत्र में
वह काफी पीछे रहा है। लेकिन वर्तमान समय में हिंदी भाषियों की
कई शिक्षण संस्थाएं
मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कालेज शुरू करने की कोशिश में हैं और
कई खुल भी गए हैं।
हिंदी भाषियों के कई ट्रेनिंग स्कूल जरूर हैं पर आईटी मेडिकल
एवं इंजीनियरिंग कालेज
उनके पास नहीं हैं।
अब कल्याण और उसके आसपास इंजीनियरिंग कालेज शुरू करने
की कोशिश की जा रही है। हिंदी भाषी समाज के रमाकांत उपाध्याय
ने इस दिशा में सबसे
पहले पहल की और उन्हें सफलता भी मिली। उनका इंजीनियरिंग कालेज
चल रहा है। इससे अनेक
छात्रों को प्रवेश भी मिल गया। डिग्री कॉलेज एवं इंजीनियरिंग
फार्मेसी कॉलेज खुलने
से कुछ हद तक प्रवेश आसान जरूर हो गया पर अभी भी हिन्दी भाषी
शिक्षा के क्षेत्र में
ऊंचाइयों को छूने के प्रयास में हैं। कल्याण में डीएड कालेज
जरूर हैं बताया जाता है
कि कुछ लोग प्रयासरत जरूर हैं पर अभी मान्यता देना प्रतिबंधित
है। वैसे कल्याण में
हिंदी भाषियों के इंटर कालेज कई हैं। गत वर्षों में हिंदी
भाषियों के कई डिग्री
कालेज भी खुले हैं। इनमें अग्रवाल कालेज,
मूथा कालेज,
साकेत विद्यापीठ प्रमुख हैं।
बहरहाल इस सत्र में छात्रों को नए कोर्स भी पढ़ने को मिल सकते
हैं और उन्हें उच्च
शिक्षा प्राप्त करने के लिए कालेजों में प्रवेश भी आसानी से
संभव हो सकता है।
उत्तर भारतीय समाज एजूकेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की
गई है। इसमें
शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सेमिनार आदि आयोजित किए जाते
रहते हैं। इंस्टीट्यूट
के अध्यक्ष विजय पंडित ने बताया कि संस्थान में एमबीए के कोर्स
शुरू किए गए हैं।
टेक्निकल कालेज भी खोलेने पर विचार चल रहा है। विजय पंडित ने
बताया कि जल्द ही
पत्रकारिता का कोर्स शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा डीएड और
बीएड कॉलेज भी खोलने के
प्रयास किए जा रहे हैं। वैसे दौलतसिंह पालीवाल,
शिवकुमार त्रिपाठी के टीचर ट्रेनिंग
स्कूल कई सालों से चल रहे हैं।

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