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क्या आशियाना बचा पायेगी प्रदेश भाजपा?
-संजय
द्विवेदी
चार दिन चली बैठक के निष्कर्षों के आधार पर
कोई कार्रवाई हो या न हो पर भाजपा के आला नेताओं
को फीडबैक तो मिल ही गया है। भाजपा
के चार दिन चले विचार मंथन में केवल और केवल
आर्तनाद और चीख-पुकारें सुनाई देती
रहीं। विधायकों से लेकर मंडी अध्यक्ष,
उपाध्यक्ष,
नगर निगम,
पालिकाओं के प्रतिनिधि
सिर्र्फऔर सिर्फ शिकायतें करते रहे। निर्वाचित
जन प्रतिनिधियों की ऐसी दीनता देखने
लायक थी,
वह भी तब,
जब पिछले साढ़े तीन सालों से उनकी सरकार सत्ता
में
है।
यह बहुत अच्छी बात है कि इस खतरे को भाजपा और
उसके मुख्यमंत्री ने चुनाव से बहुत पहले पहचान
लिया है और इस तरह की बैठकों का
सिलसिला शुरू कर कार्यकर्ताओं को अपनी बात कहने
का मौका दिया जा रहा है। पंचायत
प्रतिनिधियों के तीखे तेवरों से जब पार्टी के
दिग्गज हलाकान हो गए तो डा. रमन सिंह
ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा कि पंचायत
प्रतिनिधियों का मानदेय बहुत कम है,
इसे
बढ़ाया जाएगा। साथ ही पंचायतों के अधिकार भी बढ़ाए
जाएंगे। वहीं पार्टी के प्रभारी
धर्मेंद्र प्रधान ने भी कार्यकर्ताओं की दुखती
रग पर हाथ रखा और यह कहकर माहौल को
संभालने की कोशिश की कि भाजपा की सरकार
कार्यकर्ताओं की सरकार है। अफसरों को यह भूल
जाना चाहिए कि उनकी कार्यशैली वैसी ही बनी रहेगी,
जो खुद को नहीं बदलेंगे,
उसे
सरकार बदल देगी। जाहिर है पार्टी नेताओं के तेवर
कार्यकर्ताओं को दिलासा दिलाने में
तो सफल रहे पर आने वाले दिनों में ये क्या रूप
लेते हैं,
इसे देखना शेष
है।
भ्रष्टाचार को खुले तौर पर भाजपा में स्वीकृति नहीं है, जबकि कांग्रेस ने इसे अपनी राजनीति का हिस्सा बना रखा है। राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार के सवाल पर सहज रहने के कारण कांग्रेस में यह मुद्दा कभी आपसी विग्रह का कारण नहीं बनता, बल्कि नेता व कार्यकर्ताओं के बीच में रिश्तों को मधुर बनाता है। कांग्रेस अपने सत्ता केंद्रित, कमीशन केंद्रित कार्य व्यवहार में अपने कार्यकर्ता को भी शामिल करती है, जबकि इसके उलट भाजपा में इसे लेकर बहुत द्वंद की स्थिति है। वहां भ्रष्टाचार तो है पर उसे मान्यता नहीं है। इसके चलते भाजपा का नेता भ्रष्टाचार करते हुए कार्यकर्ताओं और जनता में दिखना नहीं चाहता। नैतिक आवरण ओढ़ने की जुगत में वह अपने काडर से दूर होता चला जाता है। उसकी सारी कोशिशें यही होती हैं कि वह किस तरह से अपने कार्यकर्ताओं, जनता और संघ परिवार के तमाम संगठनों की नजर में पाक-साफ रह सके। इसके चलते परिवार सी दिखने वाली पार्टी में घमासान शुरू होकर महाभारत में बदल जाता है। राजनैतिक तौर पर प्रशिक्षित न होने के कारण भाजपा के कार्यकर्ता भावनात्मक आधार पर कार्य करते हैं। जरा से अपमान से आहत होकर या अपने नेताओं का अहंकार देखकर वे घर बैठ जाते हैं या अपनी ही पार्टी की सार्वजनिक छवि को मटियामेट करने में जुट जाते हैं।
भाजपा पूरे
देश में इसी संकट से जूझ रही है। ऐसा ही मामला
गुटबाजी को लेकर है। कांग्रेस में एक
आलाकमान है,
जिस पर सबकी सामूहिक आस्था है। इसके बाद
कांग्रेस विभिन्न क्षत्रपों
में बंटी हुई है। गुटबाजी को कांग्रेस में पूरी
मान्यता है। यह गुटबाजी कई अर्थों
में कांग्रेस को शक्ति भी देती है। इस नेता से
नाराज कार्यकर्ता दूसरे गुट के नेता
को अपना नेता बनाकर पार्टी में अपना अस्तित्व
बनाए रख सकते हैं।
'प्रथम
परिवार'
के
अलावा उनमें किसी के प्रति कोई लिहाज नहीं है।
लोकतंत्र ऐसा कि अदना सा कांग्रेस
कार्यकर्ता किसी दिग्गज का इस्तीफा मांगता,
पुतला जलाता दिख जाएगा। भाजपा का चरित्र
इस अर्थ में बहुत आडंबरवादी है। यहां पार्टी
राष्ट्रीय स्तर पर ऊपर से नीचे तक बंटी
हुई है पर इस प्रगट गुटबाजी के बावजूद इसे संगठन
के स्तर पर मान्यता नहीं है।
गुटबाजी और असहमति को मान्यता न देने के कारण
भाजपा में षडयंत्र होते हैं। एक-दूसरे
के खिलाफ दुष्प्रचार,
मीडिया में आफ द रिकार्र्ड ब्रीफिंग,
कानाफूसी आम बाते हैं।
उमा भारती,
कल्याण सिंह,
शंकर सिंह बाघेला,
मदनलाल खुराना,
बाबूलाल मरांडी जैसे
प्रकरणों में ये बातें उजागर हो चुकी हैं। जिससे
अंतत: भाजपा को हानि ही उठानी पड़ती
है। कांग्रेस में जो गुटबाजी है,
वह तो उसे शक्ति देती है,
वहीं भाजपा की गुटबाजी
षडयंत्र का रूप लेकर कलह को स्थायी भाव दे देती
है।
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