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शक्ति प्रदर्शन: रैली से महारैला तक

निर्मल रानी

भारतीय राजनीति में भीड़तंत्र के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता। देश की सभी राजनैतिक पार्टियां यह बात भली भांति समझ चुकी हैं कि देश को चलाने के लिए यदि उन्हें सत्ता में आना है तो उन्हें अथवा उनकी पार्टी को चंद प्रतिशत बुद्धिजीवियों, शिक्षित लोगों अथवा विद्वानों मात्र के मतों से सत्ता हरगिंज नहीं मिल सकती। यदि उन्हें सत्ता दिला सकती है तो वह है आम मतदाताओं की भारी भीड़ अथवा भारी जनसमूह या जनसमर्थन। इसी बात को प्रमाणित करने के लिए पूरे भारत में विभिन्न राजनेताओं अथवा राजनैतिक दलों द्वारा समय-समय पर अपना शक्ति प्रदर्शन करने का प्रयास किया जाता है। प्राय: यह कोशिशें चुनाव का समय निकट आने पर होती हुई दिखाई देती हैं।

        जहां इन रैलियों के प्रबंधन में राजनैतिक पार्टियां रैली विशेषज्ञों के साथ मिलकर तथा अपने पूरे संगठनात्मक ढांचे की शक्ति को रैला के आयोजन में झोंककर रैली में अधिकाधिक संख्या में भीड़ इकट्ठी करने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश् बनाती हैं, वहीं मीडिया भी ऐसी रैलियों की सफलता व असफलता को बड़ी गंभीरता से लेता है। आयोजकों से लेकर देश के दूर-दरांज हिस्सों के वे लोग तक जोकि किसी रैली विशेष पर नंजरें गड़ाए बैठे होते हैं, वे भी इसी प्रतीक्षा में रहते हैं कि देखें कि आंखिर मीडिया रैली की सफलता व असफलता के विषय में क्या बोल रहा है। भीड़ के विषय में मीडिया का दावा क्या है। कितने लाख लोगों की शिरकत की बात की जा रही है। हालांकि रैली के संबंध में मीडिया के उद्धोष में कांफी विरोधाभास भी नंजर आता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी एक टी वी चैनल अथवा समाचार एजेन्सी ने किसी रैली विशेष में उपस्थित जनसमूह की तादाद तीन लाख बताई तो दूसरा चैनल अथवा एजेन्सी उसी भीड़ को दो लाख भी बता देता है।

        भारतीय राजनीति में शब्दों से खिलवाड़ करने के विशेषज्ञ हमारे राजनेता कालान्तर में तो सिंर्फ रैली ही आयोजित किया करते थे। परन्तु धीरे-धीरे शायद भारी जनसमूह के लिहांज से उन्हें 'रैली' शब्द हल्का महसूस होने लगा। उसके बाद रैला शब्द ने जन्म लिया। नेतओं द्वारा रैली के बजाए रैला आयोजित किया जाने लगा। फिर लंफ्ंफांजी के माहिरीनों को शायद इस शब्द में भी कम जान नंजर आई। और फिर एक नया शब्द आया महारैली। महारैली शब्द मात्र से ही नेतागण यह महसूस करने लगे कि महारैली का अर्थ ही होती है लाखों का हुजूम। परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया इस महारैली शब्द के भी प्राण निकलते गए। और अब वर्तमान समय में सबसे लोकप्रिय शब्द के रूप में महारैला का प्रयोग इन नेताओं द्वारा किया जा रहा है। यह तो था नेताओं द्वारा मात्र लंफ्ंफांजी के माध्यम से लाखों के हुजूम को नंजरों के सामने खड़ा देखने का ख्याली पुलाव जैसा प्रयास।

        एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि इस प्रकार के भीड़ भरे आयोजन के माध्यम से राजनेताओं द्वारा अथवा राजनैतिक दलों द्वारा जो संदेश देने के प्रयास किए जाते हैं उनमें सबसे पहले अपने प्रदेश अथवा देश की जनता को यह दिखाना होता है कि देखो सारी की सारी जनता चूंकि हमारे साथ है लिहांजा शेष जनता भी हमारे साथ आ जाए। दूसरा संदेश अपने विरोधी राजनैतिक दलों के लिए होता है जिन्हें वे अपनी जनशक्ति के माध्यम से भयभीत करना चाहते हैं। और तीसरा उद्देश्य यह भी होता है कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से वे अपने सहयोगी राजनैतिक दलों को जनता के मध्य

                                                        अपनी हैसियत तथा लोकप्रियता से रूबरू करा सकें। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यदि इस आयोजन का प्रमुख क्षेत्रीय राजनीति कर रहा हो तो ऐसे आयोजनों के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उसके महत्व को भी समझा जाए तथा उसे भी बड़े जनाधार वाला नेता माना जाए।

        बात जब रैली से लेकर महारैला तक की हो तो यह जानने की उत्सुकता भी निष्पक्ष सोच रखने वाले लोगों में बनी रहती है कि आंखिर राजनेता इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठी कैसे कर लेते हैं। इसके लिए सत्तारूढ़ दल तथा विपक्षी दल दोनों के अलग-अलग मापदंड होते हैं। निश्चित रूप से यदि सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा किसी ऐसे आयोजन की घोषणा की जाती है तो उसमें सरकारी संसाधनों का बुरी तरह से दुरुपयोग किया जाता है। ट्रैंफिक के सिपाही से लेकर जिला परिवहन अधिकारी तक एवं राज्य परिवहन आयुक्त से लेकर राज्य पुलिस प्रमुख तक की नींदें हराम हो जाती हैं। केवल गाड़ियों का ही प्रबंध इन्हें कराना नहीं पड़ता बल्कि भीड़ जुटाने तक में इन सरकारी अधिकारियों का पूरा इस्तेमाल किया जाता है। पंच-सरपंच से लेकर संगठन के वार्ड व जिला प्रमुख तक भीड़ जुटाने के लिए दिन रात सक्रिय रहते हैं। रैली से पहले कई-कई दिनों तक घूम-घूम कर आम लोगों को प्रस्तावित रैली में भाग लेने का न्यौता दिया जाता है। प्रत्येक छुटभैय्ये नेता को आयोजकों द्वारा यह निर्देश भी अब दिया जाने लगा है कि वे अपने नेतृत्व में आने वाले वाहनों पर अपना नाम लिखें तथा क्रमवार वाहन संख्या अंकित करें। ऐसा करने से छुटभैय्ये नेताओं द्वारा अपने आंका की आंख में धूल झोंकने का जो प्रयास किया जाता था, उसकी संभावना भी अब समाप्त हो गई है। यह रैली यदि विपक्षी दलों द्वारा आयोजित की जाए फिर अलबत्ता आयोजकों को कांफी मेहनत, जुगाड़बांजी आदि करनी पड़ती है। विपक्षी दलों को तो भीड़ के साथ-साथ आयोजन पर आने वाले खर्च के लिए धन भी मुहैया करना पड़ता है।

        इन सब के बीच लाख टके का एक प्रश् यह है कि ऐसे भीड़ भरे आयोजनों को नेताओं की जनता के बीच गहरी पकड़ के रूप में देखा जाए या इसे किसी नेता विशेष के कुशल प्रबंधन की संज्ञा दी जाए? किसी भी ऐसे भीड़ भरे आयोजन में शिरकत करने वालों के दो कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि वे स्वेच्छा से एवं अपनी अर्न्तात्मा की आवांज पर चलकर उस आयोजन में आए हैं। और दूसरी यह कि अमुक व्यक्ति को उसकी इच्छा के विपरीत आयोजन में लाया गया है अथवा वह किसी स्थानीय छुटभैय्ये नेता के कहने पर अथवा उसके दबाव में चलकर इस आयोजन में शरीक हुआ है। ऐसे आयोजनों में तमाम लोग तो ऐसे भी मिल जाएंगे जिन्हें यह पता ही नहीं होता कि वे यहां क्या करने आए हैं, क्यों आए हैं और क्या सुनने आए हैं तथा यहां से क्या लेकर वापस जाएंगे।

        ऐसी रैलियां जहां राजनीति में दिशा परिवर्तित अथवा निर्धारित करने का काम करती हैं, वहीं यही रैलियां आम जनता के लिए परेशानी का सबब भी बनती हैं। दुर्भाग्यवश जिस स्थान पर यह आयोजन किए जाते हैं, वहां कम से कम दो दिनों तक यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। आम जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। शहर में ट्रैंफिक नियमों की सरेआम धाियां उड़ाई जाती हैं। चारों ओर भय व तनाव का वातावरण दिखाई देता है और कभी-कभी तो वापस जाती यह भीड़ अपने पीछे लूट-खसोट व गुंडागर्दी के दृश्य भी छोड़ जाती है। बहरहाल भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की मुख्य धुरी ही चूंकि भीड़तंत्र है अत: इस प्रकार के आयोजन तो होते ही रहेंगे। हम तो नेताओं के शक्ति प्रदर्शन के इस आयोजन के भावी नए नामों की केवल प्रतीक्षा ही कर सकते हैं कि आंखिर 'रैली' से लेकर 'महारैला' तक के संफर के बाद अब और क्या?

 

 

 

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