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मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के जन्मदिन 15 अक्टूबर 2007 पर विशेष

एक डॉक्टर जो बखूबी पहचानते हैं समय की नब्ज को

 

 

वैसे तो हर अच्छे डाँक्टर को अपने मरीजों के नब्ज की अच्छी पहचान होती है, लेकिन अगर वह अपने समय की नब्ज को पहचानने में भी पारंगत हो तो बात ही कुछ और होती है। एक लोकप्रिय और सफल आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत करने वाले डॉ. रमन सिंह मरीजों की नब्ज के साथ-साथ समय की नब्ज को भी बखूबी पहचानते हैं। पिछडेपन की बीमारी से पीड़ित इस नए राज्य की नब्ज टटोलकर उन्होंने विकास योजनाओं की नई दवाओं के साथ उसे अच्छी सेहत के लिए आत्मविश्वास का साफ-सुथरा ऑक्सीजन भी दिया है। परिणाम स्वरूप इस राज्य का स्वास्थ्य तेजी से सुधर रहा है और वह तरक्की के सफर पर एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने लगा है।

छत्तीसगढ़ की प्रथम निर्वाचित सरकार के मुखिया के रूप में उन्होंने विगत लगभग चार वर्ष में अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के जरिए इस नये राज्य की जनता के दिलों की धड़कनों को पहचान कर इसे सामाजिक-आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों में देश में एक नई पहचान दिलायी है। महंगाई के इस दौर में भी गरीबी रेखा श्रेणी के 23 लाख परिवारों को सिर्फ 25 पैसे में एक किलो आयोडिन नमक देने की योजना, लगभग 33 लाख गरीब परिवारों को अत्यंत किफायती मूल्य पर हर महीने 35 किलो चावल देने की योजना, सहकारी समितियों के माध्यम से लाखों किसानों को सिर्फ छह प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण वितरण, गरीबी रेखा श्रेणी के ही लगभग नौ लाख से अधिक परिवारों को नि:शुल्क एकल बत्ती विद्युत कनेक्शन, कृषक कल्याण परिषद का गठन, गरीब परिवारों की शादी योग्य बेटियों के लिए निर्धन कन्या सामूहिक विवाह प्रोत्साहन योजना और लगभग 46 लाख स्कूली बच्चों को नि:शुल्क पाठयपुस्तकों का वितरण मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सामाजिक प्रतिबध्दता को प्रकट करती है। आम जनता से हर वक्त सीधा संवाद, हर सप्ताह अपने निवास पर 'जन दर्शन और हर साल गर्मियों में ग्राम सुराज अभियान के दौरान विकास योजनाओं की जमीनी समीक्षा के लिए गांवों के अचानक भ्रमण और वहां चौपाल लगा कर ग्रामीणों से होने वाली सीधी बातचीत से उनकी सहज-सरल लोक हितैषी कार्य संस्कृति का परिचय मिलता है।

     वास्तव में किसी भी देश अथवा राज्य को जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता को साथ लेकर सुस्पष्ट नीति और नेक नीयत से चलने वाला नेतृत्व ही उस राज्य को अथवा देश को विकास की नई ऊंचाईयों तक पहुंचा सकता है। नये छत्तीसगढ़ राज्य को भी लगभग चार साल पहले ऐतिहासिक जनादेश के साथ ऐसा ही एक क्षमतावान और ऊर्जावान नेतृत्व डॉ. रमन सिंह के रूप में प्राप्त हुआ है। कृषि प्रधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य को पलायन की पीड़ा से मुक्ति दिलाने, गांव, गरीब और किसानों के साथ शहरी श्रमिकों को भी एक बेहतर जीवन जीने का अधिकार दिलाने और सिंचाई, बिजली, सड़क और पेयजल सहित स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में प्रदेश को नई दिशा प्रदान करने तथा राज्य में औद्योगिक विकास का बेहतर वातावरण बनाने में मिली उल्लेखनीय सफलताओं से डॉ. रमन सिंह के कुशल प्रशासनिक प्रबंधन की स्पष्ट झलक आज सारा देश चकित होकर देख रहा है। कोयला, लौह अयस्क, हीरा  और बाक्साइट जैसे बहुमूल्य खनिजों सहित बेशकीमती वन सम्पदा से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में विकास की अपार सम्भावनाएं हैं। डॉ. रमन सिंह की यह स्पष्ट सोच है कि यदि यहां के इन बहुमूल्य खनिजों की रायल्टी हमें बाजार मूल्य पर मिलने लगे और प्रदेश के मैनपुर-देवभोग क्षेत्र की हीरा खदानों में उत्खनन शुरू हो जाए तो छत्तीसगढ़ हर साल कम से कम पन्द्रह हजार करोड़ रूपए का राजस्व अर्जित करते हुए स्वयं को टैक्स-फ्री राज्य के रूप में विकसित कर लेगा। जरूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर इस नए राज्य की इस आंतरिक शक्ति को महसूस करें और उसे पहचान कर विकास की परिणाम मूलक रणनीति बनाकर काम करें। डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज इसी रणनीति पर तेजी से चलते हुए निरन्तर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने विगत 7 दिसम्बर 2003 को राजधानी रायपुर के पुलिस परेड मैदान में आम जनता के बीच आम आदमी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद 24 दिसम्बर 2003 को राज्य विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सदन को संबोधित करते हुए कहा था - सरकार चलाने के लिए हमें जो जनादेश मिला है, उसका सम्मान करते हुए छत्तीसगढ़ की जनता के सपनों को पूरा करने के लिए हम वचनबध्द हैं। उन्होंने कहा था हम जोड़ने की बात करते हैं। हम तोड़ने की संस्कृति पर विश्वास नहीं करते। हमारा एक ही लक्ष्य है, और वह है सभी धर्मों, सभी समाजों के लोगों को साथ लेकर समाज के अन्तिम व्यक्ति का उत्थान। जो गरीबी रेखा से नीचे है, उसकी झोपड़ी में दीए जलें, उसको खाने के लिए अनाज मिले, उसे रोजगार मिले और वह भी समाज की मुख्यधारा में से जुड़े। डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी निर्वाचित पंचायत (विधानसभा) में अपने इसी उद्बोधन के दौरान आगे कहा था - छत्तीसगढ़ के 80 प्रतिशत लोग किसान हैं और जब किसान के खेत में फसल होगी, किसान का पेट भरा होगा, किसान के हाथ में काम रहेगा, यदि किसान सम्पन्न होगा तो डॉक्टर की डॉक्टरी चलेगी, वकील की वकालत चलेगी, व्यापारी का व्यापार चलेगा और नेता की नेतागिरी चलेगी। इसलिए जब तक छत्तीसगढ़ का किसान खुशहाल नहीं होगा, तब तक इस राज्य में खुशहाली नहीं आ सकती। अपनी इस कृषक हितैषी सोच को उन्होंने विगत चार वर्ष में लिए गए अपने अनेक क्रांतिकारी फैसलों में साबित कर दिखाया है। चाहे छह लाख लघु और सीमांत किसानों की ऋण मुक्ति का निर्णय हो, चाहे सिर्फ छह प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण देने का फैसला, समर्थन मूल्य नीति के अंतर्गत रमन सरकार ने विगत तीन वर्ष में राज्य की एक हजार 333 प्राथमिक सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों से 92 लाख मीटरिक टन धान खरीद कर उन्हें लगभग पांच हजार करोड़ रूपए का भुगतान किया। धान खरीदी में घाटा होने की बहुप्रचारित गलत फहमी को मुख्यमंत्री ने अपने कुशल प्रबंधन के जरिए दूर किया और सहकारिता के क्षेत्र में धान के सौदे को मुनाफे के कारोबार में तब्दील कर सबको यह संदेश दिया कि धान के कटोरे में धान की खेती किसानों के लिए नुकसान नहीं बल्कि कुदरत का एक अनमोल वरदान है।  किसानों के ही व्यापक हित में नियमों में बदलाव लाकर डॉ. रमन सिंह की सरकार ने राज्य में पहली बार वर्ष 2007 में एक लाख हेक्टेयर से भी अधिक रकबे में ग्रीष्मकालीन धान के लिए सिंचाई जलाशयों से पानी देने की व्यवस्था की।

बिजली उत्पादन में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के अपने भगीरथ प्रयासों के तहत मुख्यमंत्री ने एक समयबध्द रणनीति बनाकर छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल की दो हजार करोड़ रूपए से भी अधिक लागत वाली  पांच सौ मेगावाट की कोरबा (पूर्व ) ताप बिजली परियोजना की पहली इकाई को इस वर्ष पूर्ण कर दिखाया। गौरतलब है कि 250 मेगावाट की यह यूनिट विगत 17 अगस्त को विधिवत शुरू हो चुकी है। छोटी जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देने की नीति के तहत रायपुर जिले के सिकासार बांध में 07 मेगावाट बिजली का उत्पादन  शुरू हो गया है। राज्य में एक लाख किसानों को सिंचाई पम्प कनेक्शन देने के लिए छह सौ करोड़ रूपए की तीन वर्षीय कार्य योजना वर्ष 2005-06 से शुरू की गई है। इसके अंतर्गत अब तक 70 हजार से अधिक पम्पों का विद्युतीकरण किया जा चुका है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रमन सरकार ने छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी की जरूरतों को समझकर तीन नए विश्वविद्यालय प्रारंभ किए। स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय और पं. सुन्दरलाल शर्मा (ओपन) विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही राज्य में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। आदिवासी बहुल बस्तर अंचल में चिकित्सा महाविद्यालय की वर्षों पुरानी मांग प्रदेश की प्रथम निर्वाचित सरकार के मुखिया डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पुूरी की गई और जगदलपुर में बस्तर वासियों का यह सपना साकार हुआ। राजधानी रायपुर में राज्य के प्रथम और 50 वर्ष पुराने शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान का दर्जा मिला।

आदिवासी क्षेत्रों के त्वरित विकास के लिए व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए मुख्यमंत्री ने सरगुजा एवं उत्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण और बस्तर एवं दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरणों का गठन करवाया। इतना ही नहीं बल्कि अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्रों के विकास में तेजी लाने के नेक इरादे के साथ उन्होंने अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण बनवाया। आज इन तीनों प्राधिकरणों में जनता की बेहतरी के लिए तमाम फैसले जन प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हुए लिए जा रहे है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में नया छत्तीसगढ़ राज्य कृषि, सिंचाई, बिजली और सड़क निर्माण सहित  अधोसंरचना विकास के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने गांव, गरीब और किसानों की बेहतरी को अपनी कार्य सूची में पहली प्राथमिकता पर रखा है। प्रदेश के 23 लाख गरीब परिवारों को सिर्फ 25 पैसे प्रति किलो की दर से आयोडिन नमक वितरण की उनकी योजना को पूरे देश में प्रसिध्दि और प्रशंसा मिली है। डॉ. रमन सिंह की संवेदनशीलता और सहृदयता का ही यह सुपरिणाम है कि आज छत्तीसगढ़ के किसानों को सहकारी समितियों में सिर्फ छह प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण प्राप्त हो रहा है। मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना प्रदेश के गरीबों के प्रति उनकी हमदर्दी का एक नायाब उदाहरण है। इसके अन्तर्गत राज्य के लगभग तीस लाख से अधिक गरीब परिवारों को किफायती मूल्य पर हर महीनें 35 किलो चावल उपलब्ध हो रहा है। इनमें करीब 20 लाख ऐसे परिवार भी हैं, जिन्हें सिर्फ तीन रूपए प्रति किलो की दर से और शेष परिवारों को सिर्फ छह रूपए पच्चीस पैसे की दर से यह चावल दिया जा रहा है। राज्य के दो लाख से अधिक वनवासियों को सामान्य वन अपराधों के मुकदमों से मुक्ति दिलाना डॉ. रमन सिंह की सरकार का एक और क्रांतिकारी निर्णय था। भारतीय वन अधिनियम 1927 की विभिन्न धाराओं के तहत ये मुकदमें वर्ष 1952-53 से 30 जून 2004 तक दर्ज थे, जिन्हें  विगत 14 अक्टूबर 2005 को रमन सरकार ने केबिनेट की बैठक में निर्णय लेकर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। इनमें से कई मुकदमें तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे थे।

विगत लगभग चार वर्ष में छत्तीसगढ़ में जनता की सुख-समृध्दि और प्रदेश की तरक्की और खुशहाली के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गयी हैं। राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में भी छत्तीसगढ़ को पूरे देश में एक अग्रणी राज्य के रूप में अच्छी पहचान मिली है। भारत सरकार के ही कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष 2006-07 के प्रथम दस महीनें में छत्तीसगढ़ ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत अनुसूचित जातियों से संबंधित कल्याण योजनाओं में 928 प्रतिशत और आदिवासियों के कल्याण कार्यक्रमों में 703 प्रतिशत सफलता हासिल की है। देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ इन कार्यक्रमों पर अमल करने में सबसे आगे है।

इसी तरह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के क्रियान्वयन में भी छत्तीसगढ़ की गिनती देश के अग्रणी राज्यों में होने लगी है। इस योजना के तहत राज्य में लगभग डेढ़ हजार करोड़ रूपए की लागत से सात हजार किलोमीटर पक्की सड़कों और सात हजार 835 पुल-पुलियों का निर्माण करते हुए ढाई हजार से अधिक ग्रामीण बसाहटों को मुख्य सड़कों से जोड़कर बारहमासी यातायात सुविधा उपलब्ध कराई गयी है। इन्हें मिलाकर राज्य में इस योजना के तहत अब तक एक हजार 747 करोड़ रूपए की लागत से आठ हजार 390 किलोमीटर पक्की सड़कों का निर्माण किया गया है और उन पर दस हजार 254 पुल-पुलियों का भी निर्माण हुआ है।इस दौरान राज्य में राजस्व जिलों की संख्या सोलह से बढ़कर अठारह हो गयी है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी घोषणा के अनुरूप राज्य के नक्सल प्रभावित बीजापुर और नारायणपुर को राजस्व जिलों का दर्जा देकर 11 मई 2007 को उनका विधिवत उद्धाटन भी किया। नये जिलों के गठन से इन आदिवासी क्षेत्रों में विकास के एक नये युग की शुरूआत हुई है।

राज्य सरकार के योजनाबध्द प्रयासों से सिंचाई योजनाओं का नेटवर्क भी लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष 2006-07 में जल संसाधन विभाग द्वारा 185 लघु सिंचाई योजनाओं के लिए 684 करोड़ 21 लाख रूपए मंजूर किए गए, जबकि इन्हें मिलाकर विगत तीन वर्ष में लगभग तीन हजार 263 करोड़ रूपए की 482 लघु सिंचाई योजनाओं को राज्य सरकार ने अपनी स्वीकृति प्रदान करते हुए निर्माण कार्यों के लिए हरी झंडी दे दी है। इन सब का निर्माण पूर्ण होने पर एक लाख 72 हजार हेक्टेयर अर्थात लगभग चार लाख 29 हजार 569 एकड़ के रकबे में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार होगा। वर्ष 2005-06 में एक मध्यम और 42 लघु सिंचाई योजनाओं को पूण्र्[1]ा करते हुए एक लाख एकड़ से भी कुछ अधिक रकबे में सिंचाई क्षमता का विस्तार किया गया। इसी तरह वर्ष 2006-07 में भी अनेक प्रमुख योजनाओं को पूर्ण किया गया, जिनमें 43 करोड़ 81 लाख रूपए की लागत वाली खराखरा-मोहदीपाट योजना तथा राजनांदगांव जिले में शिवनाथ नदी पर 172 करोड़ रूपए की लागत से निर्मित 23 हजार 677 एकड़ सिंचाई क्षमता वाली मोंगरा बैराज सिंचाई परियोजना भी शामिल है। मोंगरा बैराज सिंचाई योजना के निर्माण में कुदरत की भी एक बड़ी चुनौती थी। इसमें पहाड़ को भीतर से चीर कर दो ऐसे टनल बनवाए गए दो टनलों के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाने की मुकम्मल व्यवस्था की गई है। यह छत्तीसगढ़ के प्रतिभावान इंजीनियरों की तकनीकी कार्य दक्षता का एक नायाब उदाहरण है। इनमें से एक टनल (सुरंग) बांध से 35 किलोमीटर पर बनवायी गई जिसकी लम्बाई छह सौ मीटर है। जबकि 1600 मीटर लम्बी एक अन्य टनल का निर्माण मुख्य नहर से 14 किलोमीटर पर किया गया।

कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति के तहत राज्य के बालोद (जिला दुर्ग) और अम्बिकापुर (जिला सरगुजा) में गन्ने के उत्पादन को ध्यान में रखकर सहकारिता पर आधारित शक्कर कारखाने की स्थापना का कार्य प्रगति पर है। बालोद में दंतेश्वरी मैया सहकारी शक्कर कारखाने की निर्माण प्रक्रिया सितम्बर 2004 से शुरू हो गयी है। इस कारखाने में 116 सहकारी समितियों सहित 14 हजार 755 किसान सदस्य के रूप में शामिल हो चुके हैं। सरगुजा जिले में अम्बिकापुर से लगभग 15 किलोमीटर पर ग्राम केरता में मां महामाया सहकारी शक्कर कारखाने का भूमिपूजन 13 मई 2007 को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा किया जा चुका है। यह प्रदेश का तीसरा कारखाना होगा। इसके निर्माण में लगभग 99 करोड़ रूपए की लागत अनुमानित है। उल्लेखनीय है कि राज्य का इकलौता शक्कर कारखाना कबीरधाम जिले में भोरमदेव सहकारी शक्कर कारखाने के नाम से संचालित किया जा रहा है। इस कारखाने में लगभग 17 हजार किसान सदस्य के रूप में शामिल हैं। राज्य शासन द्वारा इस कारखाने में गन्ना किसानों के लिए वर्ष 2006-07 में प्रोत्साहन राशि (बोनस) दस रूपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 15 रूपए कर दी गयी। विगत तीन पेराई सत्रों को मिलाकर किसानों को इस कारखाने में गन्ने के लिए लगभग 22 करोड़ रूपए का भुगतान किया गया।

तेन्दूपत्ता संग्रहणकर्ता वनवासी श्रमिकों को पिछले दो वर्ष की तुलना में इस वर्ष 19 करोड़ रूपए अधिक पारिश्रमिक दिया गया। वर्ष 2005 में उन्हें 67 करोड़ 12 लाख रूपए और वर्ष 2006 में 66 करोड़ 24 लाख रूपए का पारिश्रमिक मिला था, जबकि इस वर्ष 2007 में 85 करोड़ 80 लाख रूपए का भुगतान उन्हें किया गया। इन संग्राहकों को उनकी लघु वनोपज प्राथमिक सहकारी समितियों के माध्यम से 120 करोड़ रूपए का लाभांश भी देने की योजना है। तेन्दूपत्ता संग्रहण कार्य के लिए राज्य सरकार ने 450 रूपए प्रति मानक बोरे के पारिश्रमिक को बढ़ाकर 500 रूपए कर दिया है। प्रदेश सरकार ने इन्हें चरणपादुका देने का कार्य भी शुरू किया है। लगभग 12 लाख 53 हजार से अधिक तेन्दूपत्ता संग्राहकों को इन योजनाओं का लाभ मिल रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की सरकार ने राज्य की जनता की आवासीय जरूरतों को गंभीरता से महसूस करते हुए गृह निर्माण मंडल का गठन किया। विगत तीन वर्ष में गरीबों और आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों के लिए गृह निर्माण्ा मंडल ने बड़ी संख्या में सस्ते और साफ-सुथरे पक्के मकानों की आवासीय कॉलोनी विकसित करते हुए राज्य में आवास क्रान्ति के लिए एक उत्साहजनक वातावरण का निर्माण किया है। अटल आवास योजना, दीनदयाल आवास योजना और कुशाभाऊ ठाकरे आवास योजना के तहत दस हजार मकान बनवाए गए हैं। अपनी स्थापना के सिर्फ तीन वर्ष के भीतर छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल ने देश के प्रथम ऋण मुक्त गृह निर्माण मंडल होने का सम्मान प्राप्त किया है। इस दौरान संस्था ने 35 करोड़ 26 लाख रूपए का ऋण निर्धारित समय-सीमा से